गोस्वामी तुलसीदास कृत

श्री हनुमान चालीसा

सम्पूर्ण हनुमान चालीसा — पढ़ें, सुनें और हर मंगलवार सायं 6:30 मंदिर में सामूहिक पाठ में जुड़ें।

श्री हनुमान चालीसा

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर,
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।

गोस्वामी तुलसीदास कृत चालीस चौपाइयों का यह स्तोत्र हर मंगलवार सायं 6:30 बजे मंदिर में सामूहिक रूप से गाया जाता है।

मंगलवार पाठ में जुड़ें →
हनुमान जी
40चौपाइयाँ
2दोहे
मंगलसायं 6:30

पाठ से पहले हनुमान जी का स्मरण करें, दीप जलाएँ और शांत मन से गाएँ।

हनुमान चालीसा सुनें
हनुमान चालीसा सुनेंसाथ-साथ पाठ करें

॥ दोहा ॥

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।

बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।

बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

॥ चौपाई ॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

राम दूत अतुलित बल धामा।

अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी।

कुमति निवार सुमति के संगी॥

कंचन बरन बिराज सुबेसा।

कानन कुंडल कुंचित केसा॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।

काँधे मूँज जनेऊ साजै॥

संकर सुवन केसरीनंदन।

तेज प्रताप महा जग बंदन॥

बिद्यावान गुनी अति चातुर।

राम काज करिबे को आतुर॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।

राम लखन सीता मन बसिया॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।

बिकट रूप धरि लंक जरावा॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे।

रामचंद्र के काज सँवारे॥

लाय सजीवन लखन जियाये।

श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।

अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।

नारद सारद सहित अहीसा॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।

कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।

राम मिलाय राज पद दीन्हा॥

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।

लंकेस्वर भए सब जग जाना॥

जुग सहस्र जोजन पर भानू।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।

जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥

दुर्गम काज जगत के जेते।

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

राम दुआरे तुम रखवारे।

होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

सब सुख लहै तुम्हारी सरना।

तुम रच्छक काहू को डर ना॥

आपन तेज सम्हारो आपै।

तीनों लोक हाँक तें काँपै॥

भूत पिसाच निकट नहिं आवै।

महाबीर जब नाम सुनावै॥

नासै रोग हरै सब पीरा।

जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

संकट तें हनुमान छुड़ावै।

मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥

सब पर राम तपस्वी राजा।

तिन के काज सकल तुम साजा॥

और मनोरथ जो कोई लावै।

सोइ अमित जीवन फल पावै॥

चारों जुग परताप तुम्हारा।

है परसिद्ध जगत उजियारा॥

साधु संत के तुम रखवारे।

असुर निकंदन राम दुलारे॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।

अस बर दीन जानकी माता॥

राम रसायन तुम्हरे पासा।

सदा रहो रघुपति के दासा॥

तुम्हरे भजन राम को पावै।

जनम जनम के दुख बिसरावै॥

अंत काल रघुबर पुर जाई।

जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥

और देवता चित्त न धरई।

हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥

संकट कटै मिटै सब पीरा।

जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

जै जै जै हनुमान गोसाईं।

कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥

जो सत बार पाठ कर कोई।

छूटहि बंदि महा सुख होई॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।

होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा।

कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥

॥ दोहा ॥

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।

राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

॥ सियावर रामचंद्र की जय · पवनसुत हनुमान की जय ॥

गोस्वामी तुलसीदास
संकटमोचन हनुमान जी

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार।

संकटमोचन हनुमान जी

राम काज करिबे को
आतुर।

बल, बुद्धि और विद्या के दाता — हर मंगलवार और शनिवार मंदिर हनुमान चालीसा और सुंदरकांड से गूँज उठता है।

हनुमान पाठ बुक करें →
  1. 01
    हनुमान चालीसा · हर मंगलवार, सायं 6:30सामूहिक पाठ, आरती और प्रसाद
  2. 02
    सुंदरकांड पाठ · मंगल व शनि, सायं 6:00शनिवार का पाठ परिवार प्रायोजित कर सकते हैं
  3. 03
    हनुमान जयंती108 हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ
  4. 04
    31 हनुमान चालीसा पाठ · $201मंदिर में (घर पर $301)
  5. 05
    सुंदरकांड · प्रायोजित $251 · सामूहिक $151शनिवार का सामूहिक पाठ, प्रति परिवार
श्री रामचरितमानस · पंचम सोपान

सुंदरकांड —
पवनसुत की अमर गाथा।

पाँच अध्यायों में वह कथा, जिसमें भक्ति ने समुद्र लाँघा, अहंकार की लंका जली और राम-नाम की मुद्रिका ने माँ सीता के हृदय में आशा का दीप जलाया।

सागर-लंघन
01
प्रथम अध्याय

सागर-लंघन

जाम्बवान के वचन सुनकर पवनपुत्र को अपना विस्मृत बल स्मरण हो आया। महेन्द्र पर्वत पर चरण टिकाकर उन्होंने ऐसी छलाँग भरी कि पर्वत पाताल में धँस गया और आकाश स्वयं मार्ग देने लगा। मैनाक ने विश्राम का आग्रह किया, पर हनुमान जी ने उसे स्पर्श कर प्रणाम किया और आगे बढ़ गए। नागमाता सुरसा ने परीक्षा ली — वे विराट हुए, फिर अंगुष्ठ-मात्र होकर उसके मुख से निकल आए। छाया पकड़ने वाली सिंहिका का अंत कर, वे स्वर्णिम लंका के तट पर उतरे।

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥

— राम का कार्य पूर्ण किए बिना मुझे विश्राम कहाँ!
लंका-प्रवेश और विभीषण-मिलन
02
द्वितीय अध्याय

लंका-प्रवेश और विभीषण-मिलन

रात्रि में स्वर्ण-मंडित लंका दीपों से जगमगा रही थी। मसक-समान लघु रूप धरकर हनुमान जी ने प्रवेश किया, तो द्वार-रक्षिणी लंकिनी ने रोका। एक ही मुष्टि-प्रहार से वह गिर पड़ी और ब्रह्मा का वचन स्मरण कर बोली — अब राक्षस-कुल का अंत निकट है। महलों-अटारियों में खोजते हुए उन्होंने एक भवन देखा जिस पर राम के आयुध अंकित थे और आँगन में तुलसी लहलहा रही थी। वह विभीषण का घर था — जिसने हनुमान जी को अशोक वाटिका का मार्ग बताया।

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥

— कोसलपुर के राजा को हृदय में रखकर नगर में प्रवेश करो और सब कार्य सिद्ध करो।
अशोक वाटिका में सीता-दर्शन
03
तृतीय अध्याय

अशोक वाटिका में सीता-दर्शन

अशोक वृक्ष की छाया में, दुर्बल देह और अविचल मन से, माँ जानकी केवल राम-नाम जप रही थीं। रावण की धमकियाँ और राक्षसियों के भय भी उनकी आस्था न डिगा सके। तब वृक्ष की डाल से एक मुद्रिका उनकी गोद में आ गिरी — उस पर अंकित था मनोहर राम-नाम। हनुमान जी ने मधुर स्वर में प्रभु का गुणगान किया, और माँ के अश्रुपूरित नयनों में विश्वास जाग उठा।

कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥

— कपि के प्रेम-भरे वचन सुनकर माँ को विश्वास हुआ कि यह मन, कर्म और वचन से कृपासिंधु का दास है।
लंका-दहन
04
चतुर्थ अध्याय

लंका-दहन

माँ की आज्ञा लेकर हनुमान जी ने वाटिका के फल चखे, वृक्ष उखाड़े और अक्षय कुमार का अंत किया। मेघनाद के ब्रह्मास्त्र का मान रखकर वे स्वयं बँध गए और रावण की सभा में निर्भय होकर उसे राम की शरण में जाने का उपदेश दिया। क्रोधित रावण ने पूँछ में आग लगवाई — और वही अग्नि अहंकार की लंका के लिए काल बन गई। उनचास पवन एक साथ चले, कपि ने अट्टहास किया और अटारी-अटारी लाँघते हुए पूरी लंका धधक उठी; केवल विभीषण का भवन अछूता रहा।

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥

— हरि की प्रेरणा से उनचास पवन चल पड़े; कपि गर्जना करते हुए आकाश तक बढ़ गए।
चूड़ामणि और राम-कृपा
05
पंचम अध्याय

चूड़ामणि और राम-कृपा

समुद्र में पूँछ बुझाकर हनुमान जी माँ के पास लौटे; माँ ने पहचान-स्वरूप अपनी चूड़ामणि दी। सागर पार कर वे प्रभु के चरणों में पहुँचे। प्रभु ने उन्हें हृदय से लगा लिया और कहा कि तुम्हारे समान उपकारी न कोई देवता है, न मनुष्य, न मुनि। हनुमान जी ने विनम्रता से सिर झुकाया — यह सब आपका ही प्रताप है, प्रभु। इसके पश्चात विभीषण प्रभु की शरण में आए और सागर ने सेतु का मार्ग दिया।

सुनु कपि तोहि समान उपकारी।
नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥

— हे कपि! तुम्हारे समान उपकारी कोई देवता, मनुष्य या मुनि शरीरधारी नहीं।
01 / 05

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥

रघुनाथ जी का गुणगान सम्पूर्ण मंगलों का दाता है; जो इसे आदरपूर्वक सुनते हैं, वे बिना नौका के ही भवसागर पार कर जाते हैं।

मंदिर में सुंदरकांड पाठ — मंगल व शनि